संक्षिप्त उत्तर: सरस्वती स्तुति, जिसे सरस्वती वंदना भी कहते हैं, विद्या की देवी की एक प्रार्थना है जो आरम्भ होती है "या कुन्देन्दु तुषारहार धवला" से, अर्थात् "जो कुन्द, चन्द्रमा और हिम के समान श्वेत हैं"। इसका पहला श्लोक पूरे भारत की विद्यालय प्रार्थना-सभाओं में गाया जाता है; पूरी स्तुति में 16 श्लोक हैं। पाठ में किसी रचयिता का नाम नहीं है। विद्यार्थी पढ़ाई और परीक्षा से पहले इसका पाठ करते हैं, और परिवार वसंत पंचमी पर तथा नवरात्रि में सरस्वती पूजा के समय इसका पाठ करते हैं।

नीचे सभी 16 श्लोक देवनागरी और IAST में दिए गए हैं, हर श्लोक के बाद सरल हिंदी अर्थ के साथ, और उसके बाद पाठ की विधि तथा परीक्षा के समय के लिए एक छोटी सरस्वती प्रार्थना दिनचर्या।

सरस्वती स्तुति: पूरा पाठ अर्थ सहित

पाठ sanskritdocuments.org के संस्करण के अनुसार है। अर्थ भावानुवाद हैं, शब्दशः नहीं।

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श्लोक 1

या कुन्देन्दु-तुषारहार-धवला या शुभ्र-वस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युत-शंकर-प्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥ १॥

yā kundendu-tuṣārahāra-dhavalā yā śubhra-vastrāvṛtā
yā vīṇāvaradaṇḍamaṇḍitakarā yā śvetapadmāsanā ।
yā brahmācyuta-śaṃkara-prabhṛtibhirdevaiḥ sadā pūjitā
sā māṃ pātu sarasvatī bhagavatī niḥśeṣajāḍyāpahā ॥ 1॥

अर्थ: जो कुन्द के फूल, चन्द्रमा, हिम और मोतियों के हार के समान श्वेत हैं; जो श्वेत वस्त्र धारण किए हैं; जिनके हाथ वीणा के श्रेष्ठ दण्ड से सुशोभित हैं; जो श्वेत कमल पर विराजमान हैं; जिनकी ब्रह्मा, विष्णु, शिव और अन्य देवता सदा पूजा करते हैं: सम्पूर्ण जड़ता को पूरी तरह दूर करने वाली वे भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें।

श्लोक 2

दोर्भिर्युक्ता चतुर्भिः स्फटिकमणिमयीमक्षमालां दधाना
हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण ।
भासा कुन्देन्दु-शंखस्फटिकमणिनिभा भासमानाऽसमाना
सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना ॥ २॥

dorbhiryuktā caturbhiḥ sphaṭikamaṇimayīmakṣamālāṃ dadhānā
hastenaikena padmaṃ sitamapi ca śukaṃ pustakaṃ cāpareṇa ।
bhāsā kundendu-śaṃkhasphaṭikamaṇinibhā bhāsamānā'samānā
sā me vāgdevateyaṃ nivasatu vadane sarvadā suprasannā ॥ 2॥

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अर्थ: उनकी चार भुजाएँ हैं। एक हाथ में वे स्फटिक मणियों की माला धारण करती हैं, दूसरे में श्वेत कमल, और वे तोता तथा पुस्तक भी धारण करती हैं। कुन्द, चन्द्रमा, शंख और स्फटिक जैसी आभा से दमकती हुई वे अनुपम हैं। सदा प्रसन्न रहने वाली ये वाणी की देवी मेरी जिह्वा पर सदा निवास करें।

श्लोक 3

आशासु राशी भवदंगवल्लि
भासैव दासीकृत-दुग्धसिन्धुम् ।
मन्दस्मितैर्निन्दित-शारदेन्दुं
वन्देऽरविन्दासन-सुन्दरि त्वाम् ॥ ३॥

āśāsu rāśī bhavadaṃgavalli
bhāsaiva dāsīkṛta-dugdhasindhum ।
mandasmitairnindita-śāradenduṃ
vande'ravindāsana-sundari tvām ॥ 3॥

अर्थ: आपकी सुकोमल देह की आभा सभी दिशाओं में भर जाती है और क्षीरसागर को भी आपका दास-सा बना देती है; आपकी मंद मुस्कान शरद के चन्द्रमा को भी लज्जित कर देती है। हे कमलासन पर विराजमान सुन्दरी, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 4

शारदा शारदाम्बोजवदना वदनाम्बुजे ।
सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात् ॥ ४॥

śāradā śāradāmbojavadanā vadanāmbuje ।
sarvadā sarvadāsmākaṃ sannidhiṃ sannidhiṃ kriyāt ॥ 4॥

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अर्थ: शरद ऋतु के कमल जैसे मुख वाली, सब कुछ देने वाली शारदा हमारे मुख-कमल में सदा अपनी उपस्थिति बनाए रखें। (संस्कृत में ध्वनियों की पुनरावृत्ति का सुन्दर खेल है, इसीलिए यह श्लोक पाठ के लिए बहुत प्रिय है।)

श्लोक 5

सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृ-देवताम् ।
देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जनाः ॥ ५॥

sarasvatīṃ ca tāṃ naumi vāgadhiṣṭhātṛ-devatām ।
devatvaṃ pratipadyante yadanugrahato janāḥ ॥ 5॥

अर्थ: मैं वाणी की अधिष्ठात्री देवी उन सरस्वती की स्तुति करता हूँ, जिनकी कृपा से मनुष्य दिव्य अवस्था को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 6

पातु नो निकषग्रावा मतिहेम्नः सरस्वती ।
प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैव करोति या ॥ ६॥

pātu no nikaṣagrāvā matihemnaḥ sarasvatī ।
prājñetaraparicchedaṃ vacasaiva karoti yā ॥ 6॥

अर्थ: सरस्वती हमारी रक्षा करें, जो हमारी बुद्धि रूपी स्वर्ण की कसौटी हैं, और जो केवल वाणी से ही बता देती हैं कि कौन ज्ञानी है और कौन नहीं।

श्लोक 7

शुद्धां ब्रह्मविचारसारपरमा-माद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् ।
हस्ते स्पाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥ ७॥

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śuddhāṃ brahmavicārasāraparamā-mādyāṃ jagadvyāpinīṃ
vīṇāpustakadhāriṇīmabhayadāṃ jāḍyāndhakārāpahām ।
haste spāṭikamālikāṃ vidadhatīṃ padmāsane saṃsthitāṃ
vande tāṃ parameśvarīṃ bhagavatīṃ buddhipradāṃ śāradām ॥ 7॥

अर्थ: मैं परमेश्वरी शारदा को प्रणाम करता हूँ: जो शुद्ध हैं, ब्रह्म-विचार का परम सार हैं, आदि शक्ति हैं और समस्त जगत में व्याप्त हैं; जो वीणा और पुस्तक धारण करती हैं, अभय देती हैं, जड़ता के अंधकार को दूर करती हैं, हाथ में स्फटिक की माला लिए कमलासन पर विराजमान हैं, और बुद्धि प्रदान करती हैं।

श्लोक 8

वीणाधरे विपुलमंगलदानशीले
भक्तार्तिनाशिनि विरिंचिहरीशवन्द्ये ।
कीर्तिप्रदेऽखिलमनोरथदे महार्हे
विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ॥ ८॥

vīṇādhare vipulamaṃgaladānaśīle
bhaktārtināśini viriṃciharīśavandye ।
kīrtiprade'khilamanorathade mahārhe
vidyāpradāyini sarasvati naumi nityam ॥ 8॥

अर्थ: हे वीणा धारण करने वाली, प्रचुर मंगल देना जिनका स्वभाव है, भक्तों के दुःख का नाश करने वाली, ब्रह्मा, हरि और शिव द्वारा वन्दित, कीर्ति देने वाली, हर शुभ मनोरथ पूर्ण करने वाली, परम पूजनीय, विद्या देने वाली: हे सरस्वती, मैं आपको नित्य प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 9

श्वेताब्जपूर्ण-विमलासन-संस्थिते हे
श्वेताम्बरावृतमनोहरमंजुगात्रे ।
उद्यन्मनोज्ञ-सितपंकजमंजुलास्ये
विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ॥ ९॥

śvetābjapūrṇa-vimalāsana-saṃsthite he
śvetāmbarāvṛtamanoharamaṃjugātre ।
udyanmanojña-sitapaṃkajamaṃjulāsye
vidyāpradāyini sarasvati naumi nityam ॥ 9॥

अर्थ: हे पूर्ण खिले श्वेत कमल के निर्मल आसन पर विराजमान, जिनकी मनोहर, कोमल देह श्वेत वस्त्रों से ढकी है, जिनका सुन्दर मुख अभी-अभी खिलते श्वेत कमल के समान है, विद्या देने वाली: हे सरस्वती, मैं आपको नित्य प्रणाम करता हूँ।

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श्लोक 10

मातस्त्वदीय-पदपंकज-भक्तियुक्ता
ये त्वां भजन्ति निखिलानपरान्विहाय ।
ते निर्जरत्वमिह यान्ति कलेवरेण
भूवह्नि-वायु-गगनाम्बु-विनिर्मितेन ॥ १०॥

mātastvadīya-padapaṃkaja-bhaktiyuktā
ye tvāṃ bhajanti nikhilānaparānvihāya ।
te nirjaratvamiha yānti kalevareṇa
bhūvahni-vāyu-gaganāmbu-vinirmitena ॥ 10॥

अर्थ: हे माता, जो आपके चरण-कमलों में भक्ति रखते हुए अन्य सब कुछ छोड़कर आपका भजन करते हैं, वे यहीं, पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश और जल से बने इसी शरीर में देवत्व की अवस्था प्राप्त कर लेते हैं।

श्लोक 11

मोहान्धकार-भरिते हृदये मदीये
मातः सदैव कुरु वासमुदारभावे ।
स्वीयाखिलावयव-निर्मलसुप्रभाभिः
शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम् ॥ ११॥

mohāndhakāra-bharite hṛdaye madīye
mātaḥ sadaiva kuru vāsamudārabhāve ।
svīyākhilāvayava-nirmalasuprabhābhiḥ
śīghraṃ vināśaya manogatamandhakāram ॥ 11॥

अर्थ: हे उदार हृदय वाली माता, मोह के अंधकार से भरे मेरे हृदय में सदा निवास करें। अपने सम्पूर्ण स्वरूप की निर्मल, उज्ज्वल आभा से मेरे मन के अंधकार को शीघ्र नष्ट कर दें।

श्लोक 12

ब्रह्मा जगत् सृजति पालयतीन्दिरेशः
शम्भुर्विनाशयति देवि तव प्रभावैः ।
न स्यात्कृपा यदि तव प्रकटप्रभावे
न स्युः कथंचिदपि ते निजकार्यदक्षाः ॥ १२॥

brahmā jagat sṛjati pālayatīndireśaḥ
śambhurvināśayati devi tava prabhāvaiḥ ।
na syātkṛpā yadi tava prakaṭaprabhāve
na syuḥ kathaṃcidapi te nijakāryadakṣāḥ ॥ 12॥

अर्थ: हे देवी, ब्रह्मा संसार की रचना करते हैं, लक्ष्मीपति विष्णु उसका पालन करते हैं और शिव उसका संहार करते हैं, यह सब आपकी ही शक्ति से होता है। आपकी प्रकट कृपा के बिना वे अपने कार्य कभी पूरे नहीं कर सकते।

श्लोक 13

लक्ष्मिर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तृष्टिः प्रभा धृतिः ।
एताभिः पाहि तनुभिरष्टभिर्मां सरस्वती ॥ १३॥

lakṣmirmedhā dharā puṣṭirgaurī tṛṣṭiḥ prabhā dhṛtiḥ ।
etābhiḥ pāhi tanubhiraṣṭabhirmāṃ sarasvatī ॥ 13॥

अर्थ: लक्ष्मी, मेधा (बुद्धि), धरा (स्थिरता), पुष्टि (पोषण), गौरी, तुष्टि (संतोष), प्रभा (तेज) और धृति (धैर्य): इन आठ रूपों में, हे सरस्वती, मेरी रक्षा करें।

श्लोक 14

सरसवत्यै नमो नित्यं भद्रकाल्यै नमो नमः
वेद-वेदान्त-वेदांग- विद्यास्थानेभ्य एव च ॥ १४॥

sarasavatyai namo nityaṃ bhadrakālyai namo namaḥ
veda-vedānta-vedāṃga- vidyāsthānebhya eva ca ॥ 14॥

अर्थ: सरस्वती को सदा नमस्कार; भद्रकाली को बार-बार नमस्कार; और वेद, वेदान्त, वेदांग तथा विद्या के सभी स्थानों को नमस्कार।

श्लोक 15

सरस्वति महाभागे विद्ये कमललोचने ।
विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोऽस्तु ते ॥ १५॥

sarasvati mahābhāge vidye kamalalocane ।
vidyārūpe viśālākṣi vidyāṃ dehi namo'stu te ॥ 15॥

अर्थ: हे सरस्वती, हे महाभाग्यशालिनी, हे स्वयं विद्या स्वरूपा देवी, कमल जैसे नेत्रों वाली, विशाल नेत्रों वाली, विद्या ही जिनका रूप है: मुझे विद्या प्रदान करें। आपको नमस्कार है।

श्लोक 16

यदक्षर-पदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥ १६॥

yadakṣara-padabhraṣṭaṃ mātrāhīnaṃ ca yadbhavet ।
tatsarvaṃ kṣamyatāṃ devi prasīda parameśvari ॥ 16॥

अर्थ: जो भी अक्षर या पद छूट गया हो, जो भी उचित मात्रा के बिना बोला गया हो, हे देवी, वह सब क्षमा करें। हे परमेश्वरी, प्रसन्न हों।

समापन पंक्ति

॥ इति श्रीसरस्वती स्तोत्रं सम्पूर्णं॥

॥ iti śrīsarasvatī stotraṃ sampūrṇaṃ॥

अर्थ: इस प्रकार श्री सरस्वती स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।

सरस्वती स्तुति का पाठ कैसे और कब करें

  • हर सुबह पढ़ाई से पहले: केवल पहले श्लोक में एक मिनट से भी कम समय लगता है।
  • वसंत पंचमी: सरस्वती का वसंत पर्व, जब पुस्तकें, कलम और वाद्य उनके सामने रखे जाते हैं।
  • नवरात्रि सरस्वती पूजा: नवरात्रि के अंतिम दिन, जिनका समापन विद्यारम्भम् से होता है। देखें सरस्वती पूजा और विद्यारम्भम् और नवरात्रि के दिनवार मंत्र।
  • कितनी बार: दिन में एक बार; विशेष दिनों पर पूरी स्तुति, प्रतिदिन पहला श्लोक।

घर पर पाठ करने की सरल विधि

  1. सरस्वती के चित्र के सामने अपनी पुस्तकें पास रखकर बैठें; दीपक जलाएँ और सफ़ेद या पीला फूल अर्पित करें।
  2. एक छोटा संकल्प लें, जैसे: "माँ सरस्वती, मैं भक्तिभाव से आपकी स्तुति करता हूँ। मुझे स्पष्ट मन और अच्छी तरह सीखने का धैर्य दें।"
  3. श्लोक 1, या सभी 16 श्लोक, धीरे-धीरे पढ़ें और अंत में श्लोक 16 पढ़ें, जो भूलों की क्षमा की प्रार्थना है।

उच्चारण के सरल सुझाव

  • IAST में स्वर के ऊपर रेखा का अर्थ है दीर्घ ध्वनि: 'या कुन्-देन्-दु तु-षा-र-हा-र ध-व-ला'।
  • चिह्न या बिन्दु वाला 's' 'श' या 'ष' बोला जाता है, जैसे 'शुभ्र' (श्वेत) और 'शारदा' में।
  • श्लोक 4 में एक जैसी ध्वनियाँ अलग-अलग अर्थों के साथ दोहराई जाती हैं; धीरे-धीरे पढ़ें।
  • पहले श्लोक 1 सीखें, फिर श्लोक 15, फिर बाकी श्लोक थोड़े-थोड़े करके।

परीक्षा में सफलता के लिए सरस्वती प्रार्थना

परीक्षा के दिनों में बहुत से विद्यार्थी एक सरल, पारम्परिक दिनचर्या अपनाते हैं:

  • हर अध्ययन से पहले: श्लोक 1 पढ़ें, जड़ता दूर करने की प्रार्थना के साथ, और श्लोक 15, विद्या माँगते हुए।
  • परीक्षा की सुबह: श्लोक 2 पढ़ें, यह प्रार्थना करते हुए कि वाणी की देवी आपकी जिह्वा पर निवास करें, और अपनी कलम या पुस्तकें उनके चित्र से स्पर्श कराएँ।
  • घबराहट होने पर: श्लोक 11 धीरे-धीरे पढ़ें, जो मन के अंधकार को दूर करने की प्रार्थना है।

यह भक्ति है, अंकों का वादा नहीं। भक्तों का विश्वास है कि सरस्वती की कृपा से शांति और एकाग्रता आती है, जो नियमित अध्ययन, विश्राम और ईमानदार परिश्रम के माध्यम से फल देती है। यह भी देखें परीक्षा में सफलता के लिए 7 प्रमुख हिंदू मंत्र, विद्यार्थियों के लिए मंत्र और JEE, NEET और UPSC के लिए मंत्र।

महत्व और पारम्परिक लाभ

सरस्वती ज्ञान, वाणी, संगीत और कलाओं की देवी हैं। श्लोक 1 में उनकी श्वेतता पवित्रता और स्पष्टता का प्रतीक है, वीणा सामंजस्य का, पुस्तक विद्या का और स्फटिक माला निरंतर साधना का। भक्तों का विश्वास है कि स्तुति का पाठ जाड्य, यानी मन की जड़ता और आलस्य को दूर करता है (श्लोक 1 और 7), और वाणी में माधुर्य लाता है (श्लोक 2 और 6)। श्लोक 12 याद दिलाता है कि सृष्टि भी ज्ञान पर निर्भर है। ये पारम्परिक मान्यताएँ हैं, गारंटी नहीं। अन्य आवश्यकताओं के लिए देखें नौकरी, विवाह, स्वास्थ्य, धन और पढ़ाई के लिए किस देवता की पूजा करें।

संदर्भ: एक प्रार्थना जो विद्यालय-गीत बन गई

जैसा कि प्रायः कहा जाता है, सरस्वती ब्रह्मा के सृजनात्मक विचार से प्रकट हुईं और उन्हें सृष्टि रचने के लिए आवश्यक ज्ञान दिया। पिछली सदी में इस स्तुति का पहला श्लोक पूरे भारत के विद्यालयों में प्रातःकालीन प्रार्थना बन गया, इसलिए बहुत से लोग इसे कंठस्थ जानते हैं, बाकी स्तुति जाने बिना। पूरी स्तुति में उनके स्वरूप की प्रशंसा और विद्या की याचना करने वाले श्लोक हैं, और अनेक स्तोत्रों की तरह इसका समापन पाठ में हुई किसी भी भूल की क्षमा-याचना से होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

या कुन्देन्दु तुषारहार धवला का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है 'जो कुन्द के फूल, चन्द्रमा, हिम और मोतियों के हार के समान श्वेत हैं'। आगे श्लोक में सरस्वती का वर्णन है जो श्वेत वस्त्र धारण किए हैं, हाथ में वीणा लिए हैं, श्वेत कमल पर विराजमान हैं और ब्रह्मा, विष्णु व शिव द्वारा पूजित हैं, और अंत में प्रार्थना है: 'सम्पूर्ण जड़ता को दूर करने वाली वे भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें।'

सरस्वती स्तुति या कुन्देन्दु किसने लिखी?

पाठ में किसी रचयिता का नाम नहीं दिया गया है। यह सरस्वती के श्लोकों का एक पारम्परिक संग्रह है; कुछ परम्पराएँ इस श्लोक से आरम्भ होने वाले एक सरस्वती स्तोत्र को अगस्त्य ऋषि से जोड़ती हैं, जैसा कि परम्परा से माना जाता है। पहला श्लोक विद्यालयों में इसके प्रयोग से कहीं अधिक पुराना है और प्रार्थना-पुस्तकों में व्यापक रूप से मिलता है।

क्या सरस्वती स्तुति परीक्षा के लिए अच्छी है?

भारत और विदेश में विद्यार्थी पीढ़ियों से पढ़ाई और परीक्षा से पहले इसका पाठ करते आए हैं, स्पष्ट और स्थिर मन की प्रार्थना करते हुए। भक्तों का विश्वास है कि इससे एकाग्रता और शांति मिलती है। यह एक भक्ति साधना है, अंकों की गारंटी नहीं; यह नियमित और ईमानदार अध्ययन के साथ सबसे अच्छा फल देती है।

सरस्वती वंदना का पाठ कब करना चाहिए?

हर सुबह पढ़ाई से पहले, विद्यालय की प्रार्थना-सभा में, वसंत पंचमी पर और नवरात्रि में सरस्वती पूजा के समय। कई विद्यार्थी गुरुवार और बुधवार को भी विशेष मानते हैं। सीखने से पहले का कोई भी शांत समय उपयुक्त है।

सरस्वती स्तुति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

दिन में एक बार पर्याप्त है। कई विद्यार्थी हर अध्ययन से पहले केवल पहला श्लोक, या श्लोक 1 और 15 पढ़ते हैं, और विशेष दिनों पर पूरी स्तुति।

क्या बच्चे सरस्वती स्तुति का पाठ कर सकते हैं?

हाँ। यह उन पहली प्रार्थनाओं में से है जो बहुत से हिंदू बच्चे सीखते हैं, और हर आयु और पृष्ठभूमि के बच्चे विद्यालयों में इसका पहला श्लोक गाते हैं।

संपादक की टिप्पणी

संपादक की टिप्पणी (7 अक्टूबर 2026): यह मार्गदर्शिका अपने मूल पते पर पुनः उपलब्ध कराई गई है। संस्कृत पाठ sanskritdocuments.org के अनुसार है; विभिन्न संस्करणों और परम्पराओं में शब्दों, श्लोक-क्रम और पाठ-विधि में छोटे-मोटे अंतर मिलते हैं, इसलिए यदि आपके पास अपने परिवार या गुरु की पुस्तक है तो उसी का अनुसरण करें। हिंदी अर्थ हमारे अपने हैं। रचयिता का उल्लेख परम्परागत मान्यता के अनुसार और कथा प्रचलित रूप में दी गई है। किसी विशेष फल का वादा नहीं किया जाता।

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