भगवद्गीता और उपनिषदों में दीपावली का महत्व
परिचय: दीपावली, प्रकाश का पर्व, हिंदू परंपरा के सबसे गहन आध्यात्मिक उत्सवों में से एक है।

परिचय: दीपावली, प्रकाश का पर्व, हिंदू परंपरा के सबसे गहन आध्यात्मिक उत्सवों में से एक है।
परिचय
दीपावली, प्रकाश का पर्व, हिंदू परंपरा के सबसे गहन आध्यात्मिक उत्सवों में से एक है। यद्यपि यह पर्व लोक में विभिन्न ऐतिहासिक और पौराणिक घटनाओं से जुड़ा है, इसका गहरा महत्व भगवद्गीता और उपनिषदों के शाश्वत ज्ञान के माध्यम से सुंदर रूप से प्रकाशित होता है। ये पवित्र ग्रंथ बताते हैं कि दीपावली केवल एक बाहरी उत्सव नहीं, बल्कि एक गहन आंतरिक जागरण है—अज्ञान पर ज्ञान की, अंधकार पर चेतना की, और नश्वर अहंकार पर शाश्वत आत्मा की विजय।
प्रकाश और अंधकार का रूपक
उपनिषदों की आधारशिला
उपनिषद, जो वैदिक ज्ञान का दार्शनिक शिखर हैं, बार-बार प्रकाश को ज्ञान और अंधकार को अज्ञान के रूपक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद की प्रसिद्ध प्रार्थना इसे सुंदरता से व्यक्त करती है:
"असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय"
"मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।"
यही प्रार्थना दीपावली का आध्यात्मिक सार है। दीये जलाना केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इसी आंतरिक परिवर्तन का सशक्त प्रतीक है। प्रत्येक लौ चेतना के जागरण, अविद्या (अज्ञान) के अंधकार के निवारण, और शाश्वत आत्मा के प्रकटीकरण का प्रतिनिधित्व करती है।
कठोपनिषद की शिक्षा
कठोपनिषद आत्मा को "अणु से भी अणु, महान से भी महान" बताता है और उस आंतरिक प्रकाश की बात करता है जो सभी अनुभवों को प्रकाशित करता है। वह कहता है:
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः, तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति"
"वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है, न चंद्रमा और तारे; न वहाँ बिजली चमकती है, फिर इस अग्नि की तो बात ही क्या? उसी के प्रकाशित होने से सब कुछ प्रकाशित होता है; उसी के प्रकाश से यह सब आलोकित है।"
यह गहन श्लोक बताता है कि दीपावली का सच्चा प्रकाश चेतना का आंतरिक प्रकाश—आत्मा—है, जो स्वयंप्रकाश है और ब्रह्मांड के समस्त प्रकाश का स्रोत है। जो बाहरी दीपक हम जलाते हैं, वे इसी शाश्वत आंतरिक तेज की याद दिलाते हैं।
आंतरिक प्रकाश पर भगवद्गीता का ज्ञान
ज्ञान का दीपक
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान की परिवर्तनकारी शक्ति को एक ऐसी अग्नि बताते हैं जो सभी कर्म-मलों को भस्म कर देती है:
"यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन, ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा" (गीता 4.37)
"हे अर्जुन, जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सभी कर्मों को भस्म कर देती है।"
यह श्लोक दीपावली के सार को व्यक्त करता है—ज्ञान का उत्सव, जो पिछले कर्मों, भ्रांतियों और अज्ञान के संचित अंधकार को नष्ट करता है। यह पर्व हमें ज्ञान की उस आंतरिक अग्नि को प्रज्वलित करने की याद दिलाता है जो शुद्ध और मुक्त करती है।
ध्यान का स्थिर दीपक
श्रीकृष्ण आगे ध्यानस्थ योगी के मन का वर्णन एक स्थिर दीपक के सुंदर रूपक से करते हैं:
"यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता, योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः" (गीता 6.19)
"जैसे वायुरहित स्थान में रखा दीपक नहीं डगमगाता, वैसे ही संयमित चित्त वाले योगी का मन आत्मा के ध्यान में स्थिर रहता है।"
दीपावली पर जलाए गए दीपक इसी आंतरिक स्थिरता, शाश्वत आत्मा पर अटल एकाग्रता के प्रतीक हैं। विक्षेपों से भरे संसार में (कामनाओं और आसक्तियों की हवाओं के बीच), दीपावली हमें यह आंतरिक स्थिरता और शांति विकसित करने की प्रेरणा देती है।
आंतरिक असुरों पर विजय
भगवद्गीता आंतरिक शत्रुओं—काम (इच्छा), क्रोध, लोभ, मोह, मद (अहंकार) और मात्सर्य (ईर्ष्या)—पर विजय पाने की विस्तृत शिक्षा देती है। श्रीकृष्ण कहते हैं:
"काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः, महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्" (गीता 3.37)
"रजोगुण से उत्पन्न यह काम ही क्रोध है; यह कभी तृप्त न होने वाला और महापापी है—इसे ही इस संसार में शत्रु जानो।"
यद्यपि पौराणिक रूप से दीपावली रावण पर श्रीराम की या नरकासुर पर श्रीकृष्ण की विजय का उत्सव है, गीता गहरा सत्य उजागर करती है: ये बाहरी कथाएँ आंतरिक युद्ध के रूपक हैं। रावण दस सिरों वाले अहंकार का, नरकासुर भौतिक बंधन के अंधकार का प्रतीक है, और उनकी पराजय निम्न प्रवृत्तियों पर उच्चतर आत्मा की विजय का प्रतीक है।
श्रीराम की वापसी: एक आध्यात्मिक रूपक
दीपावली से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथा है चौदह वर्ष के वनवास और रावण पर विजय के बाद भगवान श्रीराम का अयोध्या लौटना। यद्यपि यह एक ऐतिहासिक और भक्तिपूर्ण आख्यान है, उपनिषदों और गीता की दृष्टि इसके गहरे प्रतीकवाद को प्रकट करती है:
- श्रीराम आत्मा, शुद्ध स्वरूप, धर्म के साकार रूप का प्रतीक हैं
- सीता शक्ति, चेतना या भक्ति का प्रतीक हैं, जो अस्थायी रूप से अज्ञान के कारण खो जाती है
- रावण अहंकार का प्रतीक है, जिसके दस सिर बाहर की ओर भागती दस इंद्रियों (पाँच कर्मेंद्रियाँ और पाँच ज्ञानेंद्रियाँ) को दर्शाते हैं
- वनवास भौतिक अस्तित्व में आत्मा की यात्रा का प्रतीक है
- विजय ज्ञान के जागरण का प्रतीक है, जब आत्मा अपने सच्चे स्वरूप को पुनः प्राप्त करती है
- अयोध्या वापसी "अ-योध्या" (जिसे जीता न जा सके) की अवस्था में लौटने का प्रतीक है—अविनाशी, शाश्वत चेतना
श्रीराम की वापसी पर दीप जलाना उस प्रकाश का प्रतीक है जो हमें अपने सच्चे स्वरूप की पहचान होने पर मिलता है। पूरे राज्य का उत्सव मनाना उस आनंद का प्रतीक है जो हमारे अस्तित्व के सभी पहलुओं को धर्म और सत्य के साथ एकरूप होने पर मिलता है।
श्रीकृष्ण और नरकासुर की पराजय
दीपावली से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण कथा है भगवान श्रीकृष्ण की असुर नरकासुर पर विजय और 16,000 बंदी आत्माओं की मुक्ति। गीता और उपनिषदों की दृष्टि से:
- नरकासुर तमस (अंधकार, अज्ञान, जड़ता) की शक्तियों का प्रतीक है
- बंदी आत्माएँ भौतिक तादात्म्य, सीमित धारणाओं और कर्म-संस्कारों में फँसी हमारी अपनी चेतना का प्रतीक हैं
- श्रीकृष्ण परम चेतना, अंतर्यामी आत्मा का प्रतीक हैं
- मुक्ति मोक्ष का प्रतीक है—आत्म-साक्षात्कार से मिलने वाली स्वतंत्रता
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं: "अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते" (10.8)—"मैं ही सबकी उत्पत्ति का कारण हूँ; मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है।" श्रीकृष्ण की यह विजय अपने भीतर इसी परम सत्य की पहचान है।
दीपावली के अनुष्ठानों का आंतरिक अर्थ
दीया (दीपक) जलाना
हम जो भी दीपक जलाते हैं, वह दर्शाता है:
- व्यक्तिगत आत्मा का अपने दिव्य स्वरूप के प्रति जागरण
- हमारी समझ में व्याप्त अज्ञान का निवारण
- हमारे जीवन में धर्म का प्रकाश
- भक्ति और ज्ञान का प्रज्वलन
माण्डूक्य उपनिषद चेतना की चार अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय—शुद्ध चेतना) का वर्णन करता है। दीपक इस चौथी अवस्था का प्रतीक है—वह सदा उपस्थित साक्षी चेतना जो अन्य सभी अवस्थाओं को प्रकाशित करती है।
घी और तेल का प्रयोग
परंपरागत रूप से दीपक घी या तेल से जलाए जाते हैं। इसका भी प्रतीकात्मक महत्व है:
- घी अशुद्धियों से मुक्त, निर्मल और शुद्ध मन का प्रतीक है
- बाती उस अहंकार का प्रतीक है जिसे जलकर मिटना है
- लौ आत्मा का प्रतीक है, जो अहंकार की आहुति से प्रज्वलित रहती है
जैसा कि गीता श्लोक 4.33 में सिखाती है: "श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप"—"किसी भी द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है।" दीपक हमारे अज्ञान को ज्ञान की अग्नि में अर्पित करने की आहुति बन जाता है।
सफ़ाई और सजावट
दीपावली से पहले घरों की पूरी सफ़ाई करने और रंगोली से सजाने की परंपरा का प्रतीकात्मक अर्थ है:
- सफ़ाई मन की शुद्धि (चित्त शुद्धि) का प्रतीक है
- सजावट हमारी चेतना को सद्गुणों से अलंकृत करने का प्रतीक है
- लक्ष्मी का स्वागत हर रूप में—भौतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक—समृद्धि को आमंत्रित करने का प्रतीक है
तैत्तिरीय उपनिषद घोषणा करता है: "अन्नं ब्रह्म"—"अन्न (पदार्थ/समृद्धि) ब्रह्म है।" यह शिक्षा याद दिलाती है कि धर्मपूर्वक अर्जित और विवेक से उपयोग की गई भौतिक समृद्धि भी दिव्यता की ही अभिव्यक्ति है।
आत्मा और ब्रह्म की एकता
उपनिषदों की केंद्रीय शिक्षा आत्मा (व्यक्तिगत चेतना) और ब्रह्म (सार्वभौमिक चेतना) की एकता है, जो महावाक्य में व्यक्त है: "तत्त्वमसि"—"वह तुम हो।"
दीपावली इसी पहचान का उत्सव है। व्यक्तिगत दीपक (जीव) यह जान लेता है कि वह ब्रह्मांडीय प्रकाश (ब्रह्म) से भिन्न नहीं है। छान्दोग्य उपनिषद में इसे सुंदरता से कहा गया है:
"सर्वं खल्विदं ब्रह्म"—"यह सब कुछ निश्चय ही ब्रह्म है।"
दीपावली पर जलाया गया हर दीपक इसी एकता की याद दिलाता है। हम अलग-अलग दीपक नहीं जला रहे, बल्कि अनेक रूपों में प्रकट हो रहे उसी एक प्रकाश को पहचान रहे हैं।
मानव जीवन के चार लक्ष्य (पुरुषार्थ)
भगवद्गीता और उपनिषद सिखाते हैं कि मानव जीवन के चार उचित लक्ष्य हैं:
- धर्म (सदाचार)
- अर्थ (समृद्धि)
- काम (इच्छा/सुख)
- मोक्ष (मुक्ति)
दीपावली इन चारों का सम्मान करती है:
- धर्म का उत्सव बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है
- अर्थ का आवाहन लक्ष्मी पूजा (धन की देवी की उपासना) से होता है
- काम की पूर्ति आनंदमय उत्सवों, मिठाइयों और सामाजिक मेल-जोल से होती है
- मोक्ष अंधकार पर प्रकाश की विजय का परम प्रतीक है—अज्ञान से मुक्ति
गीता इस बात पर बल देती है कि जब अर्थ और काम की साधना धर्म से निर्देशित होती है, तो मोक्ष स्वाभाविक रूप से प्राप्त होता है। दीपावली जीवन के इसी समन्वित दृष्टिकोण का सामंजस्यपूर्ण उत्सव है।
व्यावहारिक प्रयोग: दीपावली की भावना को जीना
दैनिक साधना (आध्यात्मिक अभ्यास)
भगवद्गीता आध्यात्मिक अभ्यास के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन देती है:
"योगस्थः कुरु कर्माणि" (2.48)—"योग में स्थित होकर कर्म करो।"
दीपावली के बाद हमें इन साधनों से आंतरिक प्रकाश को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए:
- नियमित ध्यान
- शास्त्रों का अध्ययन (स्वाध्याय)
- निःस्वार्थ सेवा
- सदाचार (सही आचरण)
आत्म-जिज्ञासा (आत्म विचार)
उपनिषद निरंतर आत्म-जिज्ञासा की प्रेरणा देते हैं: "मैं कौन हूँ?" यही दीपावली की भावना का सार है—शरीर और मन के साथ अस्थायी तादात्म्य से परे देखकर शाश्वत आत्मा का साक्षात्कार करना।
बृहदारण्यक उपनिषद सिखाता है: "अहं ब्रह्मास्मि"—"मैं ब्रह्म हूँ।" दीपावली इसी सत्य को स्मरण करने और जीने का उत्सव है।
तीन गुणों से ऊपर उठना
गीता तीन गुणों का वर्णन करती है जो चेतना को बाँधते हैं:
- सत्त्व (अच्छाई, शुद्धता)
- रजस (आवेग, सक्रियता)
- तमस (अंधकार, जड़ता)
दीपावली विशेष रूप से तमस पर विजय का उत्सव है। श्रीकृष्ण उपदेश देते हैं:
"ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः, जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः" (14.18)
"सत्त्व में स्थित लोग ऊपर उठते हैं, राजसी मध्य में रहते हैं, और निम्नतम गुण की वृत्तियों में स्थित तामसी लोग नीचे जाते हैं।"
दीपक जलाकर और ज्ञान का उत्सव मनाकर हम सचेत रूप से सत्त्व का विकास करते हैं और गुणातीत अवस्था की ओर बढ़ते हैं।
सार्वभौमिक संदेश
यद्यपि दीपावली एक हिंदू पर्व है, इसका संदेश सार्वभौमिक है। हर आध्यात्मिक परंपरा ज्ञानोदय, जागरण और अज्ञान पर ज्ञान की विजय की बात करती है:
- बौद्ध धर्म बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान-प्राप्ति की बात करता है
- ईसाई धर्म ईसा मसीह को "संसार का प्रकाश" कहता है
- इस्लाम "नूर" (दिव्य प्रकाश) की बात करता है
- सिख धर्म दीपावली के साथ बंदी छोड़ दिवस मनाता है
उपनिषदों की दृष्टि अत्यंत समावेशी है: "वसुधैव कुटुम्बकम्"—"पूरा विश्व एक परिवार है।" दीपावली का प्रकाश केवल हमारे घरों को ही नहीं, पूरे विश्व को आलोकित करने के लिए है, जो हमें हमारी साझी आध्यात्मिक विरासत और परम एकता की याद दिलाता है।
निष्कर्ष: स्वयं प्रकाश बनना
भगवद्गीता का समापन अर्जुन—और हम सभी—को दिए गए श्रीकृष्ण के सशक्त संदेश से होता है:
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज, अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः" (18.66)
"सभी धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा; शोक मत करो।"
यह शरणागति निष्क्रिय त्याग नहीं, बल्कि अपने सच्चे स्वरूप की सक्रिय पहचान है। दीपावली इसी पहचान का उत्सव है—कि हम अंधकार नहीं, स्वयं प्रकाश हैं।
उपनिषद घोषणा करते हैं: "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म"—"ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनंत है।" जब हम दीपावली के दीपक जलाते हैं, तो हम प्रकाश की रचना नहीं करते; हम उन आवरणों को हटाते हैं जो उस शाश्वत प्रकाश को ढके हुए हैं, जो हम पहले से ही हैं।
इस दीपावली, आइए अनुष्ठानों से आगे बढ़कर गहरे सत्य को अपनाएँ। आइए केवल अपने घरों में ही नहीं, अपने हृदय में भी ज्ञान का दीपक जलाएँ। आइए सजगता से जीकर, धर्म से कर्म करके, और स्वयं में तथा सभी प्राणियों में दिव्य प्रकाश को पहचानकर हर दिन को दीपावली बनाएँ।
जैसा कि ईशोपनिषद सुंदरता से कहता है:
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते"
"वह पूर्ण है, यह पूर्ण है; पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न होता है। पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।"
यह दीपावली आपके मार्ग को उस संपूर्ण, शाश्वत पूर्णता की ओर आलोकित करे, जो आप सदा से हैं।
ॐ शांति शांति शांति [image: 🪔]
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दिवाली 2026 की शुभकामनाएँ साझा करें
दीपावली केवल बाहर के दीयों का पर्व नहीं, बल्कि भीतर की ज्योति को जगाने का अवसर है। जब हम दीपक जलाते हैं, तो वह हमें स्मरण कराता है कि आत्मा का प्रकाश अज्ञान के हर अंधकार को दूर कर सकता है। जैसे वायुरहित स्थान में दीपक की लौ स्थिर रहती है, वैसे ही हमारा मन भी शांत और एकाग्र हो। माँ लक्ष्मी की कृपा और अंधकार पर प्रकाश की इस विजय का भाव अपने परिवार के साथ बाँटें, और ये आशीर्वाद संदेश अपने प्रियजनों तक पहुँचाएँ।
दीप श्लोक: दीपक की प्रार्थना
शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसम्पदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
Shubham karoti kalyanam arogyam dhana-sampada, shatru-buddhi-vinashaya deepa-jyotir namostu te.
"शुभं करोति कल्याणम्" प्रार्थना का अर्थ है कि मैं दीपक की उस ज्योति को नमन करता हूँ जो शुभ और कल्याण, आरोग्य और समृद्धि लाती है और दुर्भावना को नष्ट करती है।
दिवाली के लिए लक्ष्मी मंत्र
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः॥
Om Shreem Mahalakshmyai Namah.
"ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः" का अर्थ है महालक्ष्मी को नमस्कार, और "श्रीं" माँ लक्ष्मी का बीज मंत्र है।
साझा करने के लिए दिवाली 2026 संदेश
🪔 मेरे प्रिय परिवार को दीपावली की शुभकामनाएँ! हमारे घर में ज्ञान का दीप जले और हर मन में प्रेम और शांति का प्रकाश फैले। ✨ WhatsApp पर भेजें
🙏 पूज्य माता-पिता और गुरुजनों को सादर नमन। आपकी सीख हमारे जीवन का स्थिर दीपक बनी रहे। आपको आरोग्य और आनंद मिले। शुभ दीपावली! 🪔 WhatsApp पर भेजें
✨ प्रिय मित्र, इस दीपावली तुम्हारे भीतर का प्रकाश हर भ्रम और चिंता को मिटा दे, और मन सदा स्थिर और प्रसन्न रहे। 🌸 WhatsApp पर भेजें
🪔 आपको और आपके परिवार को दीपावली 2026 की मंगलकामनाएँ। हमारा हर कार्य निष्ठा, सत्य और सद्भाव के प्रकाश में आगे बढ़े। 🙏 WhatsApp पर भेजें
🌸 माँ लक्ष्मी आपके हृदय और घर दोनों को प्रकाशित करें, और आपको संतोष, विवेक और सुख का आशीर्वाद दें। शुभ दीपावली! 🪔 WhatsApp पर भेजें
🙏 जैसे भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने पर हर घर दीपों से जगमगा उठा, वैसे ही आपके जीवन में धर्म और सत्य का प्रकाश सदा बना रहे। ✨ WhatsApp पर भेजें
दिवाली की एक छोटी प्रार्थना
हे माँ लक्ष्मी और भगवान गणेश, मैं विनम्र भाव से आपको प्रणाम करता हूँ। मेरे भीतर के अज्ञान, क्रोध और लोभ के अंधकार को दूर करें और मन में विवेक का दीप जलाएँ। मेरे परिवार को स्वास्थ्य, शांति और आपसी प्रेम दें। मुझे निष्ठा से अपना कर्तव्य करने की शक्ति दें और हर परिस्थिति में कृतज्ञ रहना सिखाएँ।
इन शुभकामनाओं को अपने परिवार और मित्रों तक पहुँचाने के लिए इस पेज के शेयर बटन का उपयोग करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
2026 में दीपावली कब है?
दीपावली (लक्ष्मी पूजा) रविवार, 8 नवंबर 2026 को भारत में तथा USA, UK, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया सहित अधिकांश देशों में मनाई जाएगी। अपने शहर के पूजा मुहूर्त के लिए स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।
क्या भगवद्गीता या उपनिषदों में दीपावली का उल्लेख है?
ये ग्रंथ स्वयं इस पर्व का वर्णन नहीं करते, परंतु इनकी शिक्षाएँ इसके अर्थ को प्रकाशित करती हैं। बृहदारण्यक उपनिषद की प्रार्थना "तमसो मा ज्योतिर्गमय" (मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो) तथा ज्ञान की अग्नि (4.37) और ध्यान के स्थिर दीपक (6.19) पर गीता के श्लोक दीपावली की भावना को व्यक्त करते हैं।
दीपावली पर दीये जलाने का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
प्रत्येक दीपक आत्मा के जागरण और अविद्या, अर्थात् अज्ञान, के नाश का प्रतीक है। घी को शुद्ध मन, बाती को जलकर मिटने वाले अहंकार, और लौ को स्वयंप्रकाश आत्मा के रूप में समझा जाता है।
श्रीराम की वापसी और नरकासुर की पराजय किसका प्रतीक हैं?
प्रचलित कथाओं के अनुसार, श्रीराम का अयोध्या लौटना और श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय दीपावली की कथाएँ हैं; गीता और उपनिषदों की दृष्टि से ये उच्चतर आत्मा द्वारा अहंकार, तमस और काम-क्रोध जैसे आंतरिक शत्रुओं पर विजय के रूपक हैं।
विदेश में रहने वाले NRI दीपावली के गहरे अर्थ को कैसे अपनाएँ?
आप जहाँ भी रहें, एक दीया जलाएँ, "असतो मा" प्रार्थना का जाप करें, और परिवार के साथ गीता का कोई श्लोक, जैसे 4.37 या 6.19, पढ़ें। पर्व के बाद भी ध्यान, शास्त्र-अध्ययन, सेवा और सदाचार के माध्यम से इस भावना को बनाए रखें।




